आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "lamha-e-fursat"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "lamha-e-fursat"
सूफ़ी उद्धरण
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
गुरु नानक
ग़ज़ल
ये हिज्र ये लम्हे फ़ुर्क़त के इस तौर हमें तड़पाएँ तोइस आग में जलते जलते हम ऐ यार कहीं जल जाएँ तो
सूफ़िया दीपिका कौसर
कलाम
फ़ना बुलंदशहरी
शब्दकोश से सम्बंधित परिणाम
अन्य परिणाम "lamha-e-fursat"
ग़ज़ल
मिरे ग़म के लिए इस बज़्म में फ़ुर्सत कहाँ पैदायहाँ तो हो रही है दास्ताँ से दास्ताँ पैदा
मयकश अकबराबादी
ग़ज़ल
उसे बोसों से फ़ुर्सत है न उस को शिकवा-ए-ग़म हैबड़ी मुश्किल में हैं दोनों दहन तेरा ज़बाँ मेरी
काज़िम अ’ली बाग़
ना'त-ओ-मनक़बत
चला लिखने मैं जिस लम्हा तो सोचा क्या चमकता हैक़लम ने लिख दिया नूर-ए-शह-ए-बतहा चमकता है
शादाब रज़ा रहमती
शे'र
मैं वो गुल हूँ न फ़ुर्सत दी ख़िज़ाँ ने जिस को हँसने कीचराग़-ए-क़ब्र भी जल कर न अपना गुल-फ़िशाँ होगा
अर्श गयावी
शे'र
मैं वो गुल हूँ न फ़ुर्सत दी ख़िज़ाँ ने जिस को हँसने कीचराग़-ए-क़ब्र भी जल कर न अपना गुल-फ़िशाँ होगा
अर्श गयावी
शे'र
मैं वो गुल हूँ न फ़ुर्सत दी ख़िज़ाँ ने जिस को हँसने कीचराग़-ए-क़ब्र भी जल कर न अपना गुल-फ़िशाँ होगा
अर्श गयावी
शे'र
मैं वो गुल हूँ न फ़ुर्सत दी ख़िज़ाँ ने जिस को हँसने कीचराग़-ए-क़ब्र भी जल कर न अपना गुल-फ़िशाँ होगा
अर्श गयावी
कलाम
हरम और दैर के कतबे वो देखे जिस को फ़ुर्सत हैयहाँ हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ़ उ'न्वान-ए-मोहब्बत है
