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शे'र
माइल वारसी
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कलाम
न तो मय-कदे की है जुस्तुजू न तलाश-ए-बादा-ओ-जाम हैजो नफ़्स नफ़्स को पिला गई मुझे उस निगाह से काम है
इक़बाल सफ़ीपुरी
शे'र
या तू ने नज़र ख़ीरा कर दी ऐ बर्क़-ए-तजल्ली या हम हीदीदार में अपनी आँखों का एहसान उठाना भूल गए
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
कहाँ हैं इंतिहा-ए-ज़ौक़-ए-कामिल देखने वालेहमें देखें कि हम हैं हुस्न-ए-बातिल देखने वाले
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
क्या एक नज़र की ज़हमत भी ऐ जान-ए-जहाँ मंज़ूर नहींमैं चाहे किसी क़ाबिल न सही तेरे तो करम से दूर नहीं
कामिल शत्तारी
फ़ारसी कलाम
सूरत-ए-इंसान-ए-कामिल रा निशाँ मौला-ए-रूमसिर्र-ए-वहदत रा अतम शर्ह-ओ-बयाँ मौला-ए-रूम



