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सूफ़ी उद्धरण
सच की तलाश कोई आसान काम नहीं है। जब तक आप उस की तलाश में अकेले नहीं हो जाते, आप उसे पा नहीं सकते।
सच की तलाश कोई आसान काम नहीं है। जब तक आप उस की तलाश में अकेले नहीं हो जाते, आप उसे पा नहीं सकते।
मियाँ मीर क़ादरी
सूफ़ी उद्धरण
पीर से मुरीद की कोई हालत छिपी नहीं रहती।
पीर से मुरीद की कोई हालत छिपी नहीं रहती।
शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ
सूफ़ी उद्धरण
सच्चा सूफ़ी वह है, जिस की निगाह में पत्थर और नगीने एक हों।
सच्चा सूफ़ी वह है, जिस की निगाह में पत्थर और नगीने एक हों।
मियाँ मीर क़ादरी
सूफ़ी उद्धरण
लिबास ऐसा होना चाहिए कि कोई पहचान न सके कि तुम तसव्वुफ़ की राह के मुसाफ़िर हो।
लिबास ऐसा होना चाहिए कि कोई पहचान न सके कि तुम तसव्वुफ़ की राह के मुसाफ़िर हो।
मियाँ मीर क़ादरी
सूफ़ी उद्धरण
सूफ़ी वो है, जो 'कुछ नहीं' हो जाए। अगर वो अब भी 'हो', तो उसे 'होना' नहीं चाहिए।
सूफ़ी वो है, जो 'कुछ नहीं' हो जाए। अगर वो अब भी 'हो', तो उसे 'होना' नहीं चाहिए।
मियाँ मीर क़ादरी
दकनी सूफ़ी काव्य
मसनवी 'तुराब' दकनी
'तुराब' अब कर रक़म रंगींं-बयान-ए-ऊसुने जो ख़ल्क़ सारा दास्तान-ए-ऊ
शाह मियाँ तुराब दकनी
दकनी सूफ़ी काव्य
सवाल-ए-तालिब
गुरू-जी ओ सूकछम का कुछ भेद पाऊँतुमारे चरण के तो बलिहार जाऊँ
शाह मियाँ तुराब दकनी
सूफ़ी उद्धरण
सूफ़ी जब वज्द में होता है, तो अपनी हस्ती से ख़ाली होता है और ख़ुदा उस में बाक़ी रहता है।
सूफ़ी जब वज्द में होता है, तो अपनी हस्ती से ख़ाली होता है और ख़ुदा उस में बाक़ी रहता है।
मियाँ मीर क़ादरी
सूफ़ी उद्धरण
हक़ की तलब आसान नहीं। जब तक तुम हक़ की तलाश में अकेले नहीं हो जाते, तब तक उसे नहीं पा सकते।
हक़ की तलब आसान नहीं। जब तक तुम हक़ की तलाश में अकेले नहीं हो जाते, तब तक उसे नहीं पा सकते।





