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बैत
यही बेहतर है कि तू पर्दा में रू-पोश रहे
यही बेहतर है कि तू पर्दा में रू-पोश रहेबरमला मुँह को दिखा दे तो किसे होश रहे
अज्ञात
ग़ज़ल
मिरी हस्ती का जल्वों में तिरे रू-पोश हो जानायहीं तो है बस इक क़तरा का दरिया नोश हो जाना
अफ़क़र मोहानी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
रफ़्ती अज़ पेश-ए-मन व नक़्श-ए-तू अज़ पेश न-रफ़्तकीस्त कू दीद ब-रुख़सार-ए-तू व ज़े-ख़्वेश न-रफ़्त
अमीर ख़ुसरौ
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ ज़े-कस्रत बर रुख़-ए-वह्दत नक़ाब अंदाख़्तीतालिबाँ रा ज़ीं हिजाब अंदर अ’ज़ाब अंदाख़्ती
फ़ज़ीहत शाह वारसी
ग़ज़ल
शब-ए-असरा नक़ाब उट्ठा जो रुख़ से ना-गहाँ तेरातो ज़ाहिर हो गया 'आलम पे राज़-ए-कुन-फ़काँ तेरा
क़ातिल अजमेरी
शे'र
ख़ुश नहीं इफ़शा-ए-राज़-ए-दिल-रुबा पेश-ए-उमूमहातिफ़-ए-ग़ैबी मुझे इज़हार कहता है कि बोल
तुराब अली दकनी
ना'त-ओ-मनक़बत
नक़ाब रुख़ से ज़रा उठाना ऐ जान-ए-जानाँ कमलिया वालेवो चाँद सी सूरत दिखाना ऐ जान-ए-जानाँ कमलिया वाले
