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ग़ज़ल
प्यासा हूँ तिरी महफ़िल में आया हूँ मैं ऐ साक़ीमुझे भी रस-भरी आँखों से जाम-ए-मय पिला देना
अब्दुल हादी काविश
कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
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ग़ज़ल
ख़्वाजा शायान हसन
ग़ज़ल
ये 'राज़'-गर की करामत नहीं तो क्या है राज़ग़ुलाम-ए-सिलसिला-ए-नाम-ए-बू-तुराब किया
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
सूफ़ी उद्धरण
जब पेट ख़ाली होता है, तो पूरा जिस्म रूह बन जाता है और जब पेट भरा होता है, तो पूरी रूह जिस्म बन जाती है।
सादी शीराज़ी
दकनी सूफ़ी काव्य
क़िस्सा रूह-अफ़्ज़ा और रिज़वान-शाह
क्या ई ख़ुशी सात ई दिन गिनाएउसे दूद पीने को दाई ढुँढाय
फ़ायज़
ग़ज़ल
दिमाग़-ओ-रूह यकसाँ चाहिएँ इंसान-ए-कामिल मेंये क्या तक़्सीम-ए-नाक़िस है ख़ुदी सर में ख़ुदा दिल में
सीमाब अकबराबादी
शे'र
साँस में आवाज़-ए-नय है दिल ग़ज़ल-ख़्वाँ है 'ज़हीन'शायद आने को है वो जान-ए-बहाराँ इस तरफ़
ज़हीन शाह ताजी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ता शवद ईं जान-ए-तू रक़्क़ास सू-ए-आसमाँता कि गर्दद नूर-ए-पाकत पर्दः सोज़-ओ-गाम ज़न
रूमी
सूफ़ी उद्धरण
बदन को सलामत रखने के लिए खाना है और रूह की सलामती गुनाह छोड़ने में है।
बदन को सलामत रखने के लिए खाना है और रूह की सलामती गुनाह छोड़ने में है।