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ग़ज़ल
प्यासा हूँ तिरी महफ़िल में आया हूँ मैं ऐ साक़ीमुझे भी रस-भरी आँखों से जाम-ए-मय पिला देना
अब्दुल हादी काविश
कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
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ग़ज़ल
वो हुस्न-ए-मुस्तफ़ा अहमद ख़ुदा को सब से प्यारा हैजमाल-ए-रू-ए-जानाँ पर ग़ज़ल कहना 'इबादत है
महमूद अहमद रब्बानी
ग़ज़ल
ख़्वाजा शायान हसन
सूफ़ी उद्धरण
जब पेट ख़ाली होता है, तो पूरा जिस्म रूह बन जाता है और जब पेट भरा होता है, तो पूरी रूह जिस्म बन जाती है।
सादी शीराज़ी
कलाम
ये 'राज़'-गर की करामत नहीं तो क्या है राज़ग़ुलाम-ए-सिलसिला-ए-नाम-ए-बू-तुराब किया
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
दकनी सूफ़ी काव्य
क़िस्सा रूह-अफ़्ज़ा और रिज़वान-शाह
क्या ई ख़ुशी सात ई दिन गिनाएउसे दूद पीने को दाई ढुँढाय
फ़ायज़
ग़ज़ल
दिमाग़-ओ-रूह यकसाँ चाहिएँ इंसान-ए-कामिल मेंये क्या तक़्सीम-ए-नाक़िस है ख़ुदी सर में ख़ुदा दिल में
सीमाब अकबराबादी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ता शवद ईं जान-ए-तू रक़्क़ास सू-ए-आसमाँता कि गर्दद नूर-ए-पाकत पर्दः सोज़-ओ-गाम ज़न