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सूफ़ी कहावत
दिल बदस्त आवर की हज्ज-ए-अकबर अस्त
दूसरे लोगों के दिल जीतना मक्का में हज करने के बराबर है
वाचिक परंपरा
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
सहर चू बुलबुल-ए-बे-दिल दमे शुदम दर बाग़कि ता चू बुलबुल-ए-बे-दिल कुनम ई'लाज-ए-दिमाग़
हाफ़िज़
कलाम
आरज़ू-ए-वस्ल-ए-जानाँ में सहर होने लगीज़िंदगी मानिंद-ए-शम्अ' मुख़्तसर होने लगी
ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी
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ग़ज़ल
सहर होते ही उठ कर वो जो घर से बाहर आ-निकलाउधर ही इत्तिफ़ाक़न फिरते-फिरते मैं भी जा निकला
ख़्वाजा मीर दर्द
कलाम
अगर ऐ नसीम-ए-सहर तिरा हो गुज़र दयार-ए-हिजाज़ मेंमिरी चश्म-ए-तर का सलाम कहना हुज़ूर-ए-बंदा-नवाज़ में
अख़्तर शीरानी
शे'र
नहीं आँख जल्वा-कश-ए-सहर ये है ज़ुल्मतों का असर मगरकई आफ़्ताब ग़ुरूब हैं मिरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
सीमाब अकबराबादी
अरिल्ल
अरिल छंद - सुन्न सहर आजूब सहज धुनि लागई
सुन्न सहर आजूब सहज धुनि लागईइँगल पिंगल को खेल अमी तब पागई
गुलाल साहब
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दोश लाल-ए-तू मरा ता-ब-सहर मेहमाँ दाश्तमुर्द:-ए-हिज्र ज़े-बू-ए-तू हमः शब जाँ दाश्त





