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सूफ़ी उद्धरण
सब्र और इल्म, इन्सान की शख़्सियत को सजाते हैं।
सब्र और इल्म, इन्सान की शख़्सियत को सजाते हैं।
इमाम हुसैन
ना'त-ओ-मनक़बत
मिला इलम-ए-लदुन्नी जिस को दरबार अलहि सेवही अहल बसीरत, वाक़िफ़ राज़ निहाँ तुम हो
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
ना'त-ओ-मनक़बत
शख़्सियत हज़रत की कुछ 'आलम में पोशीदा नहींआप हैं मशहूर मिस्ल-ए-मुश्क-ए-आहू-ए-ख़ुतन
आशिक़ फ़तेहपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
'अली की ज़ात शामिल मुस्तफ़ा के राज़-दारों में'अली की शख़्सियत सब से अलग है जाँ-निसारों में
ख़्वाजा शायान हसन
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ना'त-ओ-मनक़बत
ये सब मंसूब है उस शख़्सियत के नाम-ए-नामी सेजो उन का हो वली ठहरे फिरे शैतान हो जाए