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ग़ज़ल
इस से बढ़ कर चाहते क्या रिफ़्अ’त-ए-काशाना हमनाम 'अख़्तर' है रहा करते हैं बाला-ए-फ़लक
अख़्तर नगीनवी
ना'त-ओ-मनक़बत
शादाबी-ए-जन्नत है मिरे शे'र में 'अख़्तर'तख़य्युल के दामन में हैं गुलहा-ए-मदीना
अख़्तर तलहरी
ग़ज़ल
मैदान-ए-ना’त-ए-शाह-ए-दीं 'अख़्तर' है पुर-ख़तर ज़मींये मज्लिस-ए-ग़ज़ल नहीं मुँह को ज़रा लगाम दो
अख़्तर रज़ा ख़ान
ना'त-ओ-मनक़बत
शर्बत-ए-दीद का तालिब है अज़ल से 'अख़्तर'इस तरफ़ भी करम ऐ साक़ी-ए-कौसर हो जाए
अख़्तर महमूद वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
पाते हैं नूर जिस से शम्स-ओ-क़मर फ़लक परवो 'अख़्तर'-ए-दरख़्शाँ महर-ए-जली तुम्हीं हो
अख़्तर वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
का'बा का भी का'बा है हक़ीक़त में वो 'अख़्तर'होती है नमाज़ अब तरफ़ कू-ए-मोहम्मद
अख़्तर ख़ैराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
'अख़्तर' मदीना चल के करो 'अर्ज़-ए-मुद्द'आवल्लाह दाद-रस है वो सरकार-ए-मुस्तफ़ा
अख़्तर ख़ैराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
क़तरा-ए-अश्क-ए-ग़म सरवर की क़ीमत देखिएबन गया हक़दार-ए-जन्नत ‘अख़्तर’-ए-गिर्या-कुनाँ