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शे'र
ख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों कोख़ुदा से सरकशी करने की नौबत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
दोहरा
अशरफ़ के दरबार में कहे अशरफ़ी रोय
अशरफ़ के दरबार में कहे अशरफ़ी रोयदाता तुम किरपा करो कि आसा पूरन होय
अली हुसैन अशरफ़ी
ग़ज़ल
तेरा भला हो 'क़ादरी' मेरा भरम मिटा दियाअब क्यूँ रिंद-ए-बे-रिया उलझे तकल्लुफ़ात में
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
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कलाम
मौसूफ़ सिफ़त में पिन्हाँ है तन्क़ीद गवारा कैसे होहै दीद-ए-बुताँ दीदार-ए-ख़ुदा इंकार का यारा कैसे हो
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
दोहरा
ख़्वाजा के दरबार में लागी मोरी आस
ख़्वाजा के दरबार में लागी मोरी आसअब हमरी सुध लीजिए जिन मोंहे करो निरास
अली हुसैन अशरफ़ी
ग़ज़ल
ज़बान-ए-’इश्क़ गर समझाए फ़रमान-ए-ख़ुदावंदीतो मय-ख़ाने की ज़द में फिर शरी'अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
बैत
ख़्वाजा-ए-हिंद वो दरबार है आ'ला तेरा
ख़्वाजा-ए-हिंद वो दरबार है आ'ला तेराकभी महरूम नहीं माँगने वाला तेरा
हसन रज़ा बरेलवी
शे'र
उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
ग़ज़ल
वो रुस्वाई को डरता है यहाँ है वस्ल की ख़्वाहिशयही बस एक आफ़त है यही ऐ 'शम्स' मुश्किल है