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शे'र
ख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों कोख़ुदा से सरकशी करने की नौबत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
दोहरा
अशरफ़ के दरबार में कहे अशरफ़ी रोय
अशरफ़ के दरबार में कहे अशरफ़ी रोयदाता तुम किरपा करो कि आसा पूरन होय
अली हुसैन अशरफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
औज-ए-विलायत के हो माह तख़्त-ए-ख़िलाफ़त के हो शाहदीन-ए-मोहम्मद की पनाह ऐ बादशाह-ए-अस्फ़िया
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
कलाम
तेरा भला हो 'क़ादरी' मेरा भरम मिटा दियाअब क्यूँ रिंद-ए-बे-रिया उलझे तकल्लुफ़ात में
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
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मुनाजात
अच्छे प्यारे के सदक़े में मौला
सदक़ा-ए-आल-ए-रसूल-ए-अकरम कासदक़ा असहाब का 'अता फ़र्मा
क़ारी अमानत रसूल
कलाम
मौसूफ़ सिफ़त में पिन्हाँ है तन्क़ीद गवारा कैसे होहै दीद-ए-बुताँ दीदार-ए-ख़ुदा इंकार का यारा कैसे हो
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
दोहरा
ख़्वाजा के दरबार में लागी मोरी आस
ख़्वाजा के दरबार में लागी मोरी आसअब हमरी सुध लीजिए जिन मोंहे करो निरास
अली हुसैन अशरफ़ी
ग़ज़ल
ज़बान-ए-’इश्क़ गर समझाए फ़रमान-ए-ख़ुदावंदीतो मय-ख़ाने की ज़द में फिर शरी'अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
बैत
ख़्वाजा-ए-हिंद वो दरबार है आ'ला तेरा
ख़्वाजा-ए-हिंद वो दरबार है आ'ला तेराकभी महरूम नहीं माँगने वाला तेरा
हसन रज़ा बरेलवी
ग़ज़ल
वो रुस्वाई को डरता है यहाँ है वस्ल की ख़्वाहिशयही बस एक आफ़त है यही ऐ 'शम्स' मुश्किल है