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सूफ़ी शब्दावली
ना'त-ओ-मनक़बत
बसर हो ज़िंदगी 'इज़्ज़त में तेरी चाहे ज़िल्लत मेंतिरे क़ब्ज़े में बंदे कुछ नहीं है दस्त-ए-क़ुदरत में
उवेस रज़ा अम्बर
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शे'र
वो तूर वाली तिरी तजल्ली ग़ज़ब की गर्मी दिखा रही हैवहाँ तो पत्थर जला दिए थे यहाँ कलेजा जला रही है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
नज़र वाले शरीक-ए-जल्वा-गाह-ए-तूर होते हैंकि हर महफ़िल के दुनिया में अलग दस्तूर होते हैं
नख़्शब जार्चवि
ग़ज़ल
कोई जाए तूर पे किस लिए कहाँ अब वो ख़ुश-नज़री रहीन वो ज़ौक़-ए-दीदा-वरी रहा न वो शान-ए-जल्वा-गरी रही
पीर नसीरुद्दीन नसीर
ना'त-ओ-मनक़बत
ज़िंदगी का है मज़ा तो आप के दरबार मेंहै ख़ुदा वालों की जन्नत कूचा-ए-दिलदार में
इश्तियाक़ आलम शहबाज़ी
ग़ज़ल
ये हिज्र ये लम्हे फ़ुर्क़त के इस तौर हमें तड़पाएँ तोइस आग में जलते जलते हम ऐ यार कहीं जल जाएँ तो
सूफ़िया दीपिका कौसर
ना'त-ओ-मनक़बत
शरी'अत की तुम्हीं से ज़िंदगी है ग़ौस-ए-जीलानीहक़ीक़त की तुम्हीं को आगही है ग़ौस-ए-जीलानी