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सूफ़ी लेख
बाबा फ़रीद के श्लोक- महमूद नियाज़ी
हज़रत जाइसी के क़ौल से दो अहम बातें मा’लूम होती हैं। पहली बात तो ये है
मुनादी
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हज़रत सय्यद कमालुद्दीन अ’ल्लामा चिश्ती
(2) हज़रत शैख़ मीराँ।(A) हज़रत मख़दूम शैख़ मोहम्मद, सुल्तान इब्राहीम शाह शर्क़ी के ज़माने में जौनपुर
सय्यद रिज़्वानुल्लाह वाहिदी
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फ़िरदौसी - सय्यद रज़ा क़ासिमी हुसैनाबादी
हासिदों ने उसकी उ’म्मीद पूरी होने न दी।सितम तो ये हुआ कि अपने क़याम-ए-ग़ज़नी के दौरान
ज़माना
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हज़रत गेसू दराज़ का मस्लक-ए-इ’श्क़-ओ-मोहब्बत - तय्यब अंसारी
वल्लाह ख़िलाफ़ नीस्त कि ऊ इ’श्क़-बाज़ शुदअख़बारुल-अख़्यार में लिखा है उसी के बा’द से गेसू दराज़
मुनादी
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तजल्लियात-ए-सज्जादिया
जैसा कि किताबों में आया है कि जब हज़रत शाह अकबर दानापुरी इस ख़ाकदान-ए-गेती पर जल्वा-अफ़रोज़
अहमद रज़ा अशरफ़ी
सूफ़ी लेख
सय्यिद सालार मस्ऊद ग़ाज़ी
बादशाह (फ़िरोज़ शाह तुग़लक़) ने 776 हिज्री मुताबिक़ 1374 ई’स्वी में बहराइच का सफ़र किया और
जुनैद अहमद नूर
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चिश्तिया सिलसिला की ता’लीम और उसकी तर्वीज-ओ-इशाअ’त में हज़रत गेसू दराज़ का हिस्सा
उख़ुव्वत की जहाँ-गीरी, मोहब्बत की फ़रावानीइस बर्र-ए-सग़ीर का शाएद ही कोई ऐसा गोशा हो जहाँ चिश्ती