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सूफ़ी लेख
उ’र्फ़ी हिन्दी ज़बान में - मक़्बूल हुसैन अहमदपुरी
4۔ मा लज़्ज़त-ए- फ़क़्रेम सख़ा रा न-शनासेमनासूरे ज़े-ज़ख़्मेम शिफ़ा रा न-शनासेम
ज़माना
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हज़रत शैख़ बुर्हानुद्दीन ग़रीब
ग़िज़ा:ऊपर ज़िक्र आया है कि तीस साल तक दाऊदी रेज़े रखे । इफ़्तार कभी सिर्फ़ पानी,
सूफ़ीनामा आर्काइव
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समाअ’ और आदाब-ए-समाअ’- मुल्ला वाहिदी देहलवी
समाअ’ की तीन किस्में हैं।एक समाअ’ तमाशे और खेल के तौर पर सुना जाए। तमाशा और
मुनादी
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बिहार में क़व्वालों का इतिहास
सासाराम के रहने वाले पनाह अली क़व्वाल गाने में उस्ताद कहलाते थे। पनाह अली सितार अच्छी
रय्यान अबुलउलाई
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अमीर ख़ुसरो की सूफ़ियाना शाइ’री - डॉक्टर सफ़्दर अ’ली बेग
“ख़ुदाया मैंने तेरी तमन्ना में सब कुछ तज दिया है और मुझे बस अब तेरी ही
फ़रोग़-ए-उर्दू
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सतगुरू नानक साहिब
“मेंढ़क कंवल के पास ही रहता है लेकिन हक़ीक़त में हज़ारों कोस दूर है क्यूँकि कंवल
सूफ़ीनामा आर्काइव
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हज़रत शैख़ बहाउद्दीन ज़करिया सुहरावर्दी रहमतुल्लाह अ’लैह
हज़रत शैख़ बहाउद्दीन ज़करिया के मतबख़ में तरह तरह के खाने पकते थे लेकिन उनको उन
सूफ़ीनामा आर्काइव
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हज़रत बंदा नवाज़ गेसू दराज़ - सय्यिद हाशिम अ’ली अख़तर
तक़रीबन पाँच साल के बा’द आप अपनी वालिदा, जद्दा हज़रत बी-बी रानी और अपने बड़े भाई
मुनादी
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बहादुर शाह और फूल वालों की सैर
बारहदरी के मंडवे से मिला हुआ झरना का दूसरा दरवाज़ा है और इस के बा’द अमरैयाँ।
मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग
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याद रखना फ़साना हैं ये लोग - डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन ख़ाँ
हम आवाज़-ए-जरस की तर्ह से तन्हा भटकते हैं।।एक और चीज़ जिसने ज़फ़र को मक़्बूल-ओ-महबूब बनाया वो