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क़िबला-ए-आब-ओ-गिल तुम्हीं तो होकाबा-ए-जान-ओ-दिल तुम्हीं तो हो
मैं तन्हा आब-ओ-रंग बज़्म-ए-इम्काँ हो नहीं सकताये दिल वापस अगर तू इस में मेहमाँ हो नहीं सकता
तेरे आगे लताफ़त-ए-शबनमशर्म से आब आब होती है
हूँ आब आब मैं ’अरक़-ए-इंफ़ि’आल सेफिर किस तरह नमाज़ मिरी बे-वुज़ू रहे
ग़र्क़ दरिया-ए-ख़जालत हूँ मैं हो कर आब-आबजिन्हें ढूँढा किए दैर ओ दिल नशीं दिल नशीं थे वो
दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्तीआब-ए-ख़ंजर से दो रहे हैं
होंट आब-ए-हयात से लबरेज़ज़ख़्मी रूहों की तिश्नगी के लिए
दिल-तराज़ आब रिया ज़ाहिर मनेबहर-ए-इस्तिंजा रहें दर पेच-ओ-ताब
बहर-ए-हस्ती में हमीयत सोहबत-ए-अहबाबयूँ है जैसे बरु-ए-आब-ए-हबाब
हमीं पे तुम्हारे है सम आब-ओ-दानाक़सम भी जो खाएँ तो खाएँ तुम्हारी
आईना आब तमव्वुज से बहा जाता हैकहिए तस्वीर से गिरना न कहीं देख सँभल
मैं फ़त्ह-याब हूँ बरसर-ए-आब हूँवो है बख़्शिश मेरी वो मेरा भाग है
एक बर्बाद जवानी पे जो रोय बरसोंआह वो दीदा-ए-पुर-आब कहाँ फिर होंगे
मैं एक नक़्श-ए-आब 'निज़ामी' था दरमियाँउस ने मिटा दिया मुझे बे-कार देख कर
बर्फ़ पिलवा के कलेजा मिरा ठंडा कर देआब अंगूर ने तो आग लगा दी साक़ी
ख़राब फिरता है दीवाना क्यूँ बगूला साज़मीं में सूरत-ए-आब-ए-रवाँ समा न गया
क्या क्या लिबास शान-ए-करम के हैं देखनाख़ाक-ए-शिफ़ा हुई कहीं आब-ए-बक़ा हुई
ख़बर मेरी रेहलत की सुन कर वो बोलेकि आज उठ गया आब-ओ-दाना किसी का
साबिर 'अली मुझे अब तेरी अदा ने मारातिश्ना-दहन को साबिर आब-ए-बक़ा ने मारा
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