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कलाम
ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का आलमतिरा हुस्न दस्त-ए-ईसा तिरी याद रू-ए-मर्यम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
न मैं आलिम न मैं फ़ाज़िल न मुफ़्ती न क़ाज़ी हूना दिल मेरा दोज़ख़ ते ना शौक़ बहिश्ती राज़ी हू
सुल्तान बाहू
कलाम
'अजब क्या गर मुझे 'आलम ब-ईं वुस'अत भी ज़िंदाँ थामैं वहशी भी तो वो हूँ ला-मकाँ जिस का बयाबाँ था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
निशात-ओ-कैफ़ का आ'लम ज़मीं से आसमाँ तक हैख़ुदा मा'लूम तेरे हुस्न की दुनिया कहाँ तक है
माहिरउल क़ादरी
कलाम
पढ़ पढ़ इलम हज़ार कताबाँ आलिम होए भारे हूहर्फ़ इक इश्क़ दा पढ़ न जाणन भुल्ले फिरन विचारे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
एक 'आलम है कि मक़्तल में है क़ातिल की तरफ़धार ख़ंजर की फ़क़त ’आशिक़-ए-बे-दिल की तरफ़
आसी गाज़ीपुरी
कलाम
कहो बुलबुल से ले जावे चमन से आशियाँ अपनापढ़े गर सद हज़ार अफ़्सूँ न होगा बाग़बाँ अपना