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कलाम
बुतों के 'इश्क़ में खोया गया हूँ वर्ना ऐ 'अख़्तर'ख़ुदा शाहिद है मैं अक्सर ख़ुदा को याद करता हूँ
हरी चंद अख़्तर
कलाम
अख़्तर शीरानी
कलाम
अब क्या सोचें क्या होना है जो होगा अच्छा होगापहले सोचा होता पागल अब रोने से क्या होगा
जावेद अख़्तर
कलाम
जिस्म दमकता ज़ुल्फ़ घनेरी रंगीं लब आँखें जादूसंग-ए-मरमर ऊदा बादल सुर्ख़ शफ़क़ हैराँ आहू
जावेद अख़्तर
कलाम
भरोसा किस क़दर है तुझ को 'अख़्तर' उस की रहमत परअगर वो शैख़-साहिब का ख़ुदा निकला तो क्या होगा
हरी चंद अख़्तर
कलाम
जावेद अख़्तर
कलाम
तिरी ताबानियाँ हैं सुब्ह के ताबिंदा अख़्तर मेंतिरी शब-रंगियाँ हैं शाम की ज़ुल्फ़-ए-मु’अंबर में