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कलाम
चश्म में ख़ल्क़ की गो मिस्ल-ए-हबाब आता हूँऐ'न-ए-दरिया हूँ हक़ीक़त में बहा जाता हूँ
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
कलाम
अगर ये रेख़्ता सय्यद कोई मशहद में ले जाएतयक़्क़ुन है कि शौहरत-याफ़्ता हो मुल्क-ए-ईराँ में
सय्यद अली केथ्ली
कलाम
तू ये न समझ अल्लाह कि है तस्कीन तेरे दीवानों कोवहशत में हमारा हँस पड़ना दर-अस्ल हमारा रोना है
साग़र निज़ामी
कलाम
उस के चेहरे पे ख़ुदा जाने ये कैसा नूर थावर्ना ये दीवानगी कब इ'श्क़ का दस्तूर था
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
कलाम
प्रेम-नगर की राह कठिन है सँभल-सँभल के चला करोराम राम को मन में जपो तुम ध्यान उसी में धरा करो
सय्यद महमूद
कलाम
बुज़ुर्गों का ख़फ़ा होना भी शफ़क़त से नहीं ख़ालीकि गर्मी-ए-रुख़ गर्दूं-निशाँ है अब्र-ओ-बाराँ का
सय्यद अली केथ्ली
कलाम
दिल ’आशिक़-ए-जवाहर ख़ाना-ए-तक़दीर है शायदकि सदहा मोतियों को आँसुओं के तार से बाँधा
सय्यद अली केथ्ली
कलाम
कब का रुस्वा मेरे आ'माल मुझे कर देतेमेरी क़िस्मत कि मिला तुझ-सा ख़ता-पोश मुझे