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कलाम
कोई शुग़्ल-ए-नीस्ती में नीस्त-ओ-नाबूद हैकोई नज़्ज़ारा में हक़ के इक तमाशा-तौर है
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
शाह ख़ामोश साबरी
कलाम
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
आंधियों और मौज-ए-तूफ़ाँ से गुज़र जाने के बा'दनाव डूबी है मिरी दरिया उतर जाने के बा'द
साग़र सिल्लोड़ी
कलाम
ले तिरे मन-चले का सौदा है खट्टा और मीठारूप रंग पर फूल न दिल में देख 'अक़्ल के बेरी
बहादुर शाह ज़फ़र
कलाम
'अजब ए'तिबार-ओ-बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगीमैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है
सलीम कौसर
कलाम
लाखों दर लाखों हुए हैं ग़र्क़ हो के बे-निशाँबहर-ए-वहदत से जो निकला वो शनावर और है
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
मुझ ‘आसिम-ए-बे-दिल से जो पूछेंगे कहूँगाहम तो शह-ए-ख़ादिम के तलब-गार हैं यारो
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
बेदम शाह वारसी
कलाम
मुझे बस उस के सिवा और कुछ नहीं मा'लूमये जानता हूँ तुम्हारा हूँ और क्या जानूँ
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
रातों का तसव्वुर है उन का और चुपके-चुपके रोना हैऐ सुब्ह के तारे तू ही बता अंजाम मिरा क्या होना है