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कलाम
हिरदे में बसो साबिर प्यारो नहीं चैन पड़त मोहे एक घड़ीतरपत रोवत बीतत है दिन और रात कटत तारे गिन-गिन
हाफ़िज़ हैदराबादी
कलाम
कभी तार-ए-क़फ़स कटता नहीं शहबा-ए-हिज्राँ मेंनए जौहर हैं ऐ क़ातिल मिरी तेग़-ए-गरेबाँ में
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
है तीर-ए-निगह-ए-बज़्म-ए-अ'दू में मिरी जानिबग़ुस्से में छुपाया है मोहब्बत की नज़र को
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
सूरत-ए-शैख़ में उसे रूयत-ए-हक़ नसीब हैराम को राम कर लिया ‘साबिर’-ए-बुत-परस्त ने
साबिर हुसैनी चिश्ती
कलाम
कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ानाकब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
अब्र है जाम है मीना है मय-ए-गुल-गूँ हैहै सब अस्बाब-ए-तरब साक़ी-ए-गुलफ़ाम नहीं