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कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
मुझ ‘आसिम-ए-बे-दिल से जो पूछेंगे कहूँगाहम तो शह-ए-ख़ादिम के तलब-गार हैं यारो
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
किया बे-घाट है 'औघट' जनाब-ए-शाह-'वारिस' नेसमझ में ख़ुद नहीं आती है ऐसी अपनी मंज़िल है
औघट शाह वारसी
कलाम
मोहम्मद सब से पहले हम गुनहगारों को पूछेंगेहमें वो भूल सकते हैं शफ़ी'-उल-मुज़नबीं हो कर
बेदम शाह वारसी
कलाम
मर जाऊँगा ’इश्क़-ए-शह-ए-ख़ादिम में मैं 'आसिम'मेरे लिए इस दहर में बस नाम यही है
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
नबी सदक़े ‘क़ुत्ब’ शह को नहीं आधार की हाजतकि दोनों जग मने आधार है ख़ैरुल-बशर मुझ को
कुली कुतुब शाह
कलाम
नाज़ाँ शोलापुरी
कलाम
दो दिन की तन-आसानी के लिए तक़दीर का शिकवा कौन करेरहना ही नहीं जब दुनिया में दुनिया की तमन्ना कौन करे
शाह महमूदुल हसन
कलाम
दोनों के दो घरों में दोनों का है ठिकानाबैत-उल-हराम में तुम बैत-उल-हलाल में हम