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कलाम
है तीर-ए-निगह-ए-बज़्म-ए-अ'दू में मिरी जानिबग़ुस्से में छुपाया है मोहब्बत की नज़र को
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
कभी तार-ए-क़फ़स कटता नहीं शहबा-ए-हिज्राँ मेंनए जौहर हैं ऐ क़ातिल मिरी तेग़-ए-गरेबाँ में
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
'सौदा-गर' हाल-ए-मिर्ज़ा पाकर ये कह रहा हैहै ज़ात कंज़-ए-मख़्फ़ी ज़ात-ए-बक़ा-ए-मिर्ज़ा
शाह सिद्दीक़ सौदागर
कलाम
हनूज़ इक परतव-ए-नक़्श-ए-ख़याल-ए-यार बाक़ी हैदिल-ए-अफ़सुर्दा गोया हुजरा है यूसुफ़ के ज़िंदाँ का
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
हिरदे में बसो साबिर प्यारो नहीं चैन पड़त मोहे एक घड़ीतरपत रोवत बीतत है दिन और रात कटत तारे गिन-गिन
हाफ़िज़ हैदराबादी
कलाम
क़ुर्बान-ए-फ़ना एक तजल्ली-ए-तेरी होएज़ुल्मत-कदा-ए-हस्तती-ए-मौहूम से निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
ढूँढ उस जगह किशवर-ए-’अली बाब-ए-’इल्म है’उक़्दा वहीं से होवे है हल मुश्किलात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
इस क़दर आँखें मिरी महव-ए-तमाशा हो गईंपुतलियाँ पथरा के आख़िर संग-ए-मूसा हो गईं