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कलाम
दोनों जौलाँ-गाह-ए-जुनूँ हैं बस्ती क्या वीराना हैउठ के चला जब कोई बगूला दौड़ पड़ा वीराना भी
आरज़ू लखनवी
कलाम
ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इ’श्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रहीन तो तू रहा न तो मैं रहा जो रही सो बे-ख़बरी रही
सिराज औरंगाबादी
कलाम
जुनून-ए-आगही हूँ शोरिश-ए-हक़्क़-ए-सदाक़त हूँमैं 'इरफ़ान-ए-मोहब्बत हूँ मैं तूफ़ान-ए-मसर्रत हूँ
धर्म सरूप
कलाम
दो-जहाँ जल्वा-ए-जानाँ के सिवा कुछ भी नहींहम ने कुछ और न देखा तो ख़ता कुछ भी नहीं''
ज़हीन शाह ताजी
कलाम
ताहिर मुरादाबादी
कलाम
ख़ाम की जाणन सार फ़क़र दी महरम नहीं दिल दे हूआब मिट्टी थीं पैदा होए खामी भांडे गिल्ल दे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
आरज़ू-ए-वस्ल-ए-जानाँ में सहर होने लगीज़िंदगी मानिंद-ए-शम्अ' मुख़्तसर होने लगी