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कलाम
डरें क्यूँ अहल-ए-’इस्मत ताबिश-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर सेकि होगा सर पर उन के साएबाँ यूसुफ़ के दामन का
क़ाज़ी उमराव अली जमाली
कलाम
हिरदे में बसो साबिर प्यारो नहीं चैन पड़त मोहे एक घड़ीतरपत रोवत बीतत है दिन और रात कटत तारे गिन-गिन
हाफ़िज़ हैदराबादी
कलाम
कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ानाकब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
अब्र है जाम है मीना है मय-ए-गुल-गूँ हैहै सब अस्बाब-ए-तरब साक़ी-ए-गुलफ़ाम नहीं
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
कभी तार-ए-क़फ़स कटता नहीं शहबा-ए-हिज्राँ मेंनए जौहर हैं ऐ क़ातिल मिरी तेग़-ए-गरेबाँ में
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
रोज़-ए-अबद तक आप हैं सालार-ए-जैश-ए-अंबियारोज़-ए-अज़ल से मुर्शिद-ए-अहल-ए-सफ़ा भी आप हैं
अहमद नदीम क़ासमी
कलाम
वो तो अल्मास-ए-नगीं हैं या कि हैं दुर्र-ए-यमींकाँच की तू पोत है या रेज़ा-ए-बिल्लौर है
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का 'आलमतिरा हुस्न दस्त-ए-’ईसा तिरी याद रू-ए-मर्यम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
ख़ानक़ाह-ए-चिश्त में जिस ने क़दम पहला रखादूसरा उस का क़दम फिर अर्श-ए-बाला पर हुआ
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
है तीर-ए-निगह-ए-बज़्म-ए-अ'दू में मिरी जानिबग़ुस्से में छुपाया है मोहब्बत की नज़र को