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कलाम
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ परमैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
तड़पते लौटते सीना-सिपर होते हैं बिस्तर परदहान-ए-ज़ख़्म का हर दाँत है क़ातिल के ख़ंजर पर
शरफ़ुद्दीन कानपुरी
कलाम
प्रेम प्याला जब से पिया है जी का है ये हालअँगारों पर नींद आ जाए काँटों पर आराम
तुफ़ैल होशियारपुरी
कलाम
ग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकले