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कलाम
ये कौन ग़ज़ल-ख़्वाँ है पुर-सोज़-ओ-निशात-अंगेज़अंदेशा-ए-दाना को करता है जुनूँ-आमेज़
अल्लामा इक़बाल
कलाम
मिरी ज़ीस्त पुर-मसर्रत कभी थी न है न होगीकोई बेहतरी की सूरत कभी थी न है न होगी
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
बहुत ही बे-वफ़ा निकले बहुत ही पुर-जफ़ा निकलेसमझ रखा था हम ने तुम को क्या अफ़्सोस क्या निकले
नादिर देहलवी
कलाम
शौक़-ए-नज़ारा है जब से उस रुख़-ए-पुर-नूर काहै मिरा मुर्ग़-ए-नज़र परवाना शम्अ'-ए-तूर का
इब्राहीम ज़ौक़
कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैंजुर्म सिर्फ़ इतना है उन को प्यार करते हैं
इक़बाल सफ़ीपुरी
कलाम
कहते हैं किस को दर्द-ए-मोहब्बत कौन तुम्हें बतलाएगाप्यार किसी से कर के देखो ख़ुद ही पता चल जाएगा