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कलाम
हिरदे में बसो साबिर प्यारो नहीं चैन पड़त मोहे एक घड़ीतरपत रोवत बीतत है दिन और रात कटत तारे गिन-गिन
हाफ़िज़ हैदराबादी
कलाम
यार था गुलज़ार था मय थी फ़ज़ा थी मैं न थालाएक़-ए-पा-बोस-ए-जानाँ क्या हिना थी मैं न था
मिर्ज़ा अबुल मुज़फ़्फ़र
कलाम
लेकर जहाँ के हुस्न को शम्स-ओ-क़मर को क्या करूँमुझ को तो तुम पसंद अपनी नज़र को क्या करूँ
अब्दुल हादी काविश
कलाम
सूरत में मेरे प्यारे जो कुछ कि है सो तू हैहै दिल में ये हमारे जो कुछ कि है सो तू है