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कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
छलक जाए जो मेरी बे-ख़ुदी-ए-दिल का पैमानाअभी हो जाए मय-ख़ाने से बाहर राज़-ए-मय-ख़ाना
तुरफ़ा क़ुरैशी
कलाम
जो पूछा हम ने हसरत-ए-वस्ल की कब दिल से निकलेगीतो फ़रमाने लगे हँस कर बड़ी मुश्किल से निकलेगी
अज्ञात
कलाम
सँभल ऐ दिल किसी का राज़ बे-पर्दा न हो जाएये दीवानों की महफ़िल है कोई रुस्वा न हो जाए
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
ये दिल है वो मकाँ जो ला-मकाँ वाले की मंज़िल हैवो लैला है इसी में ये उसी लैला का महमिल है