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कलाम
मु’ईनुद्दीन चिश्ती के जो कहलाते हैं हम 'आशिक़जहाँ में ख़ास ’इश्क़-ए-हैदर-ए-कर्रार रखते हैं
आशिक़ हैदराबादी
कलाम
मोहब्बत के लिए दिल ढूँड कोई टूटने वालाये वो मय है जिसे रखते हैं नाज़ुक आबगीनों में
अल्लामा इक़बाल
कलाम
ग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकले
अल्लामा इक़बाल
कलाम
भला 'मज्ज़ूब' कुछ तो होश रखते ऐसे मौक़ा' परग़ज़ब है मेज़बाँ बनना पड़ा उस को जो मेहमाँ था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़रुत्बे में मेहर-ओ-माह से कम-तर नहीं हूँ मैं
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
छुपा रखेंगे दाग़-ए-सीना को हम वस्ल-ए-जानाँ मेंकि मिस्ल-ए-सुब्ह इक ख़ुर्शीद रखते हैं गरेबाँ में