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कलाम
मुर्शिद है शाहबाज़ इलाही रलया संग हबीबाँ हूतक़दीर इलाही छिक्कियां डोराँ मिलसी नाल नसीबाँ हू
सुल्तान बाहू
कलाम
तस्बीह दा तूँ कसबी होयों दम मारें संग बलियाँ हूदिल दा मणका इक न फेरें गल पावें पंज वीहाँ हू
सुल्तान बाहू
कलाम
नाल कुसंगी संग न करिए कुल नूँ लाज न लाइए हूतुंमे मूल तरबूज़ न होंदे तोड़ मक्के लै जाइये हू
सुल्तान बाहू
कलाम
दर्शन सिंह
कलाम
मुझ को काफ़ी है ये संग-ए-दर-ए-जानाना मिरायही का'बा है मिरा और यही बुत-ख़ाना मिरा
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी हैतर्क-ए-तअल्लुक़ काम न आया उन से मोहब्बत आज भी है