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नज़्अ' में हम हैं ग़म-ए-इ'श्क़ ये चलाता हैदेख ग़ुर्बत में मुझे छोड़ न मरने वाले
इ'श्क़-ए-मिज़्गाँ में कहाँ सूरत-ए-आराम 'अमीर'नींद उड़ जाएगी बिस्तर पे जो काँटा होगा
इ'श्क़-ए-रुख़्सार में इक़बाल-ए-सिकंदर पायाआईना दस्त नगर है तिरे हैरानों का
इ'श्क़-ए-हुस्न-ए-नमकीन का जो उठाना है मज़ापहले कुछ ज़ाइक़ा-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर पैदा कर
नज़्अ' में हम हैं ग़म-ए-इ'श्क़ ये चिल्लाता हैदेख ग़ुर्बत में मुझे छोड़ न मरने वाले
रहरव-ए-राह-ए-इ'श्क़ हूँ जुज़ दर्दकोई तो शह मिरी कमर में नहीं
सब आफ़तों से छूट गया कर के तर्क-ए-हिर्सक्यूँ-कर न हो मुझे दिल-ए-बे-आरज़ू पसंद
'बेदम' नमाज़-ए-इश्क़ यही है ख़ुदा-गवाहहर-दम तसव्वुर-ए-रुख़-ए-जानानः चाहिए
आहों से सोज़-ए-इ'श्क़ मिटाया न जाएगाआँधी से ये चराग़ बुझाया न जाएगा
तिरा क्या काम अब दिल में ग़म-ए-जानाना आता हैनिकल ऐ सब्र इस घर से कि साहिब-ख़ाना आता है
दोनों ’आशिक़ हैं मगर है इ'श्क़ में अलबत्ता फ़र्क़मैं निसार-ए-हुस्न हूँ बुलबुल है क़ुर्बान-ए-बहार
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