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कलाम
देखे या न देखे ये तो महबूब का हक़ हैन तू आह-ओ-फ़ुग़ाँ कर न तू ग़ैरों सा गिला दे
डॉ. ताहिर-उल-क़ादरी
कलाम
वो हक़ के साथ राबिता-ए-दिल नहीं रहामज्ज़ूब उस लक़ब ही के क़ाबिल नहीं रहा
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
दीद-ए-जमाल-ए-हक़ हुई हुस्न-ए-निगार देख करबन गए बुत-परस्त हम सूरत-ए-यार देख कर
शब्बीर साजिद मेहरवी
कलाम
जुनून-ए-आगही हूँ शोरिश-ए-हक़्क़-ए-सदाक़त हूँमैं 'इरफ़ान-ए-मोहब्बत हूँ मैं तूफ़ान-ए-मसर्रत हूँ
धर्म सरूप
कलाम
दर्शन सिंह
कलाम
ख़ुदी से बे-ख़ुदी में आ जो शौक़-ए-हक़-परसती हैजिसे तू नीस्ती समझा है ऐ ग़ाफ़िल वो हस्ती है
अमीर मीनाई
कलाम
हर नक़्शा किस से हक़ के सिवा मुम्किनात काहर फ़र्द है जहाँ में आईना ज़ात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
मंबा’-ए-नूर-ए-ज़ात है जल्वा-गर सिफ़ात हैतालिब-ए-हक़ बिया-बिया ख़ाक-ए-रह-ए-हिजाज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
'इश्क़ में जो मंज़िल मिलती है यूँ ही नहीं मिलती 'कौसर'बरसों वीरानों के सरों पर ख़ाक उड़ाई लोगों ने
कौसर आरफ़ी
कलाम
नहीं ताब कौसर-ए-’आरफ़ी’ कोई साग़र-ए-मय-ए-कौसरीये दयार लाला-रुख़ाँ नहीं ये क़लंदरों का मक़ाम है