जहाँ तक है नज़र जिस की वहाँ तक जल्वा-गर सेहरा
रोचक तथ्य
سہرا بموقعۂ تقریبِ نکاح خواجہ شاہ شاہد حسین نقشبندی (سجادہ نشیں : بارگاہ حضرت عشق، تکیہ شریف، پٹنہ) سالِ نکاح : 1362ہجری
जहाँ तक है नज़र जिस की वहाँ तक जल्वा-गर सेहरा
है अपने हुस्न की वुस'अत में ता-हद्द-ए-नज़र सेहरा
क़रीब-ए-ज़ुल्फ़ सोने की किरन है रहनुमा दिल की
सवाद-ए-शाम में है जलवा-ए-नूर-ए-सहर सेहरा
उसी हुस्न-ए-अदब ने सरफ़राज़ी उस को बख़्शी है
तुम्हारी पा-ए-पोशी को झुका है किस क़दर सेहरा
फ़रोग़-ए-हुस्न देखा हुस्न का ए'जाज़ भी देखा
चिपक जाती हैं आँखें दिल में आता है नज़र सेहरा
मुबारक हो शह-ए-शाहिद हसीन-ए-बा-जफ़ा तुम को
ये शादी जश्न-ए-ग़ाज़ी तख़्त-ए-शादी ताज-ए-सर सेहरा
ये है 'मक़सूद'-ए-साल-ए-तहनियत का मिस्रा' रौशन
सवाद-ए-शाम में है आमद-ए-नूर-ए-सहर सेहरा
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