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चादर

उर्स के साथ इस रस्म को मनाया जाता है। चादर आदर और सम्मान की अलामत है। मुरीद चादर के चारों कोनों को पकड़ कर खड़े होते हैं और साथ साथ बाकी मुरीद चलते हैं। चारों कोनों से पकड़ कर चादर सर के ऊपर टांग ली जाती है और साथ साथ क़व्वाल चादर पढ़ते हैं। उर्स के अलावा बाकी दिनों में भी चादर-पोशी के दौरान चादर पढ़ी जाती है।

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सय्यदुल-औलीया की चादर है

अकबर वारसी मेरठी

इलाही सर पे रहे दस्तगीर की चादर

पीर नसीरुद्दीन नसीर

मर्द-ए-ख़ुदा हक़-बीं की चादर

पीर नसीरुद्दीन नसीर

उठाओ सर पे कि इक ताजवर की चादर है

पीर नसीरुद्दीन नसीर

हक़ीक़त-नुमा नूर-ए-पैकर की चादर

पीर नसीरुद्दीन नसीर

ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगाँ की चादर है

ख़्वाजा नाज़िर निज़ामी

मज़हर-ए-किब्रिया की चादर है

ख़्वाजा नाज़िर निज़ामी

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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