तिरे 'आशिक़ पे जो गुज़रे है कब इज़हार करता है
तिरे 'आशिक़ पे जो गुज़रे है कब इज़हार करता है
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
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तिरे 'आशिक़ पे जो गुज़रे है कब इज़हार करता है
कोई पूछे है कुछ उस से तो ठंडी साँस भरता है
ज़माना बस कि है नाज़ुक जहाँ वो पाँव धरता है
खड़ा होता नहीं वाँ अपनी परछाईं से डरता है
ग़रज़ ना-गुफ़्ता ब-अहवाल-ए-दिल है दिल में मरता है
खड़ा है तो खड़ा ही है जो बैठा है तो बैठा है
फिरे है तो फिरे ही है जो लेटा है तो लेटा है
बके है तो बके ही है जो चिपका है तो चिपका है
हँसे है तो हँसे ही है जो रोता है तो रोता है
ख़बर अपनी न बेगानी सदा यूँ दिन गुज़रता है
गया है रह के जिस-जिस घर में तो उस को दिखाई दे
वहाँ जाए है छुप कर रात को सब को चुकाई दे
खड़ा हो हो के आहट ले है कुछ हो तो सुनाई दे
'अजब हालत है बिन तेरे ख़ुदा तुझ तक रसाई दे
कभी ढूँडे है छत पर जा कभी नीचे उतरता है
ये दिल है या कोई फोड़ा न पके है न फूटे है
इलाही दर्द से उस की तो हर शब दम ही टूटे है
उसे समझाऊँ हूँ जूँ-जूँ ये छाती अपनी कूटे है
मोहब्बत का जिसे लपका हो कोई उस से छोटे है
अज़ल से होवे जो बिगड़ा किसी से कब सँवरता है
भला मुंसिफ़ हो जी बहलाए 'फ़िद्वी' अब क्या जान कर
रखे किस तर्ह अपने यार तुझ बिन दिल को समझा कर
किसी गुलशन को या सहरा को जब निकले है घबरा कर
तो वाँ आफ़त ये है उस पर जहाँ बैठा जगह पा कर
तस्वीर में हो तो मौजूद उस को ले उभरता है
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