वही जल्वा किसी को हो गई थी जिस से हैरानी
वही जल्वा किसी को हो गई थी जिस से हैरानी
वही जल्वा कि देख आया कोई जिस को ब-आसानी
वही जल्वा कि है दोनों जहाँ में जिस की ताबानी
वही जल्वा यहाँ भी कर रहा है नूर-अफ़्शानी
शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी
हम उस के हैं कि जिस की है सरापा ज़ात नूरानी
हम उस के हैं कि जिस का है लक़ब महबूब-ए-यज़्दानी
हम उस के हैं नहीं कौनैन में जिस का कोई सानी
हम उस के हैं कि जिस ने आल की की हम पे क़ुर्बानी
हमारे सामने नार-ए-जहन्नम क्यूँ न हो पानी
मुझे दरकार है कब है जहाँ-बानी-ओ-सुल्तानी
तमाशा है फ़ुसूँ है खेल है ये बज़्म-ए-इम्कानी
मिरे नज़्दीक ये अर्ज़-ओ-समा हैं सब के सब फ़ानी
न लूँगा मैं अगर मुझ को मिलेगा बाग़-ए-रिज़वानी
जो हाथ आ जाए क़िस्मत से तिरे रौज़ा की दरबानी
कुछ इस दर्जा हुई है आज-कल ग़म की फ़रावानी
कुछ इस दर्जा तरक़्क़ी पर है इन रोज़ों परेशानी
कुछ इस दर्जा हुआ है चर्ख़ मेरा दुश्मन-ए-जानी
मरे घर रात-दिन रंज-ओ-अलम की अब है मेहमानी
ख़बर लीजिए ख़ुदा रा आके अब महबूब-ए-यज़्दानी
बताऊँ क्या कि है बहर-ए-अलम में कैसी तुग़्यानी
मिरे सर से बहुत ही अब तो ऊँचा हो गया पानी
समझता हूँ कि मेरी जान तो इस ग़म में है जानी
मगर इतनी तमन्ना है मिरी इस्लाम के बानी
दम-ए-आख़िर झुके तेरे ही दर पर मेरी पेशानी
मुझे परवा नहीं गर बहर-ए-'इस्याँ में है तुग़्यानी
पहुँच जाएगी साहिल पर मिरी कश्ती ब-आसानी
वो 'आसी हूँ कि जिस की रहमत-ए-हक़ ख़ुद है दीवानी
गुनाहों से नहीं महशर में कुछ मुझ को पशेमानी
मिरा जब काम है 'नाज़िम' मोहम्मद की सना-ख़्वानी
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