'आलम में है इक धूम कि सुल्तान की है आमद
'आलम में है इक धूम कि सुल्तान की है आमद
हर मोर का है क़ौल सुलेमाँ की है आमद
तारीक थी शब शम'-ए-शबिस्ताँ की है आमद
रौशन है कि ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँ की है आमद
आमद है ये उस नूर की जो नूर-ए-ख़ुदा है
इस नूर से किया शान-ए-ख़ुदा जल्वा-नुमा है
हर क़तरा ये कहता है कि ’आली-हमम आया
हर ज़र्रा की आवाज़ है मेहर-ए-करम आया
हर बर्ग का है क़ौल कि साहिब-ए-हशम आया
हर फूल है ख़ंदाँ कि सिराज-ए-क़दम आया
ताइर भी नशेमन में हैं ख़ुश-धूम पड़ी है
ग़ुल वहशियों में है कि ये शादी की घड़ी है
आती है बहार आमद-ए-शाह-ए-शोहदा है
मेहमान के लेने को चले क़स्द-ए-सबा है
पाई है जो बू और यही फूलों में हवा है
जो सर्व है वो मुंतज़िर-ए-शाह खड़ा है
है चश्म-बरह सर को झुकाती नहीं नर्गिस
फूली हुई जामे में समाती नहीं नर्गिस
आमद है जो ख़ुर्शीद-ए-रिसालत की सर-ए-ख़ाक
सज्दे को सर-ए-ख़ाक झुके पड़ते हैं अफ़्लाक
हर वक़्त कवाकिब को भी इस बात की है ताक
आँखों में लगे सुर्मा-ए-ख़ाक-ए-क़दम-ए-पाक
हूरें भी हैं ख़ुश-'ऐश ये ग़िल्माँ भी तुले हैं
है बारिश-ए-रहमत दर-ए-फ़िरदौस खुले हैं
बुतख़ानों में ये कुफ़्र से कहती है ज़लालत
रहने का ठिकाना नहीं ग़ारत की है दहशत
बुत करते हैं झुँझला के बरहम से इशारत
दी तूने ये मस्जूद बना कर हमें ज़िल्लत
क्या ख़्वार हुए दीदा-ए-अर्बाब-ए-यक़ीं में
शक़ काश ज़मीं हो कि समा जाएँ ज़मीं में
मय-ख़ाना-ए-’इरफ़ाँ है खुला 'ऐश है ज़ाहिर
मय-ख़्वार भी हैं पाक नए शौक़ भी ज़ाहिर
नए अंदाज़ सवालों के किए हैं पैदा
बदले देखें हैं जो अंदाज़-ए-करम आज की रात
ले लिया बख़्शिश-ए-उम्मत का ख़ुदा से इक़रार
हब्बज़ा शान-ए-शहंशाह-ए-उमम आज की रात
आप के हल्क़ा-ए-गेसू-ए-मुसलसल के तुफ़ैल
मुश्किलें हल हुई जितनी थीं अहम आज की रात
उठ गया पेश-ए-उहुद बुर्क़ा-ए-मीम-ए-अहमद
नज़र एक आते हैं इम्कान-ओ-क़दम रात की रात
पुतलियाँ हूर-ओ-मलाइक की बिछी हैं तस्ख़ीर
ता-बनीन-ए-फ़र्श रह-ए-शाह-ए-उमम आज की रात
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