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मी-रवम बाशद कि बीनम रू-ए-यार

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

मी-रवम बाशद कि बीनम रू-ए-यार

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

MORE BYअहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

    मी-रवम बाशद कि बीनम रू-ए-यार

    'इनायत हाँ कि आमद वक़्त-ए-कार

    मैं अपने दोस्त से मिलने जा रहा हूँ,

    हाँ मेरे काम का वक़्त हो गया है।

    जाँ ब-दस्त-ए-ख़्वेश कर्दः मी-रवम

    ता कुनम दर कू-ए-यार-ए-ख़ुद निसार

    मैं अपनी जान अपने साथ ले कर जा रहा हूँ,

    ताकि अपनी जान को अपने मोहब्बत के कोचे पर निसार कर सकूँ।

    'अक़्ल-ए-मन मसरूफ़ जाम-ओ-साग़रस्त

    वाइज़ा दस्त अज़ मन दीवानः-वार

    मेरी बुद्धि जाम और पैमाना की चिंता में व्यस्त है,

    अरे प्रवचनकार, मुझे पागल ही रहने दे।

    बा तु दर मय-ख़ान:-अम बाशद नमाज़

    बे-तु-अम दर का'बा न-बुवद कारोबार

    तेरे साथ तो मैखाना में भी नमाज़ अदा हो जाएगी,

    लेकिन तेरे बग़ैर काबा में भी कोई काम नहीं हो पाएगा।

    चूँ सुलैमाँ बा-तु दारद बाक नीस्त

    गरचे बा-ऊ देव मर्दुम हसत यार

    चूंकि सुलैमान तुम्हारे साथ है, इसलिए वह ख़ौफज़दा नहीं है, हालांकि मेरे दोस्त, उसके साथ इंसान नामक शैतान मौजूद है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अर्मग़ान-ए-बिहार शरीफ़ हज़रत अहमद लंगर दरिया बलख़ी की हयात और शाइ’री और मलफ़ूज़ात का तंक़ीदी जाएज़ा ا (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : डॉक्टर हसन इमाम
    • प्रकाशन : लेबल आर्ट प्रेस शाह गंज़, महिंदर रोड, पटना (1998)

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