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न-मांद: आब दर दिल-ए-मुफ़्लिसाँ रा

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

न-मांद: आब दर दिल-ए-मुफ़्लिसाँ रा

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

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    न-मांद: आब दर दिल-ए-मुफ़्लिसाँ रा

    ब-कुन लुत्फ़े करीमाँ बे-कसाँ रा

    मुफ़लिसों और ग़रीबों के दिल में अब ताब बाक़ी नहीं है इसलिए करीम तू लाचारों और बेकसों पर रहम फरमा।

    न-याबी चूँ मन-ए-बेचारः मिस्कीं

    शिकस्तः दिल ब-'आलम हेच जाँ रा

    मैं कितना लाचार और बेबस हूँ और मेरा टूटा हुआ दिल किस क़दर बेजान हो चुका है।

    न-बाशद चारः-साज़ हेच कारे

    बग़ैर अज़ लुत्फ़-ए-तू बे-चारगाँ रा

    सिवाए तेरे रहम और करम के, बेबसों के लिए अब कोई और चारा और इलाज नहीं है।

    हमः कस ए'तिमाद-ए-ख़्वेश कर्दन्द

    पनाह-ए-तुस्त मा आवार्गां रा

    सब खुद अपने आप पर भरोसा करते हैं, लेकिन हम जैसे परेशानहालों की पनाहगाह फ़क़त तू ही है।

    चु 'अहमद' रा गदा-ए-ख़्वेश ख़्वानी

    देहद ताज-ए-सरी हर ख़ुस्रुवाँ रा

    अहमद को अपना फ़क़ीर कहकर उसके सर पर शाहों का ताज रख दो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अर्मग़ान-ए-बिहार शरीफ़ हज़रत अहमद लंगर दरिया बलख़ी की हयात और शाइ’री और मलफ़ूज़ात का तंक़ीदी जाएज़ा (पृष्ठ 48)
    • रचनाकार : डॉक्टर हसन इमाम
    • प्रकाशन : लेबल आर्ट प्रेस शाह गंज़, महिंदर रोड, पटना (1998)

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