तल'अत-ए-मेहर-ए-हुदा सुब्ह-ए-स'आदत को सलाम
तल'अत-ए-मेहर-ए-हुदा सुब्ह-ए-स'आदत को सलाम
अब्दुल अज़ीज़ दब्बाग़
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तल'अत-ए-मेहर-ए-हुदा सुब्ह-ए-स'आदत को सलाम
आप की मीलाद को यौम-ए-विलादत को सलाम
'अज़मत-ए-ग़ार-ए-हिरा और उस की रिफ़'अत को सलाम
आमद-ए-जिब्रील को आक़ा की बे'सत को सलाम
सरवर-ए-कौनैन की ख़त्म-ए-नबुव्वत को सलाम
आप की मे'राज को औज-ए-रिसालत को सलाम
उन के लुत्फ़-ओ-जूद की बे-पायाँ वुस'अत को सलाम
जो मुहीत-ए-दो-जहाँ है अब्र-ए-रहमत को सलाम
आप की तख़्लीक़ उम्मत की मशक़्क़त को सलाम
और दु'आ-ए-बख़्शिश-ए-तक़्सीर-ए-उम्मत को सलाम
उस की हुरमत के लिए जुहद-ए-हिदायत को सलाम
रोज़-ए-महशर अपनी उम्मत की शफ़ाअत को सलाम
दिल के ताले तोड़ देता जो बयान-ए-जाँ-फरोज़
आप की इस दिलरुबा दिल-साज़ दा'वत को सलाम
उन के क़ल्ब-ए-पाक पर नाज़िल हुई जो 'अर्श से
इस जहाँ-अफ़रोज़ क़ुरआँ की तिलावत को सलाम
आप की तस्कीन-ए-जाँ थी जिस की तरतील-ए-नुज़ूल
इस पयाम शौक़ की हर एक आयत को सलाम
जिस से शरह-ए-सद्र का क़ुल्ज़ुम हुआ तूफ़ाँ ब-दोश
लहजा-ए-लहन-ए-नबी की उस हलावत को सलाम
उन के दर पर की अगर तौबा तो हो जाए क़बूल
प्यारे आक़ा से ख़ुदा की उस मोहब्बत को सलाम
ऐ ख़ुदा प्यारे नबी की सब दु'आओं पर दुरूद
सुब्ह-ए-ता'मीर-ए-जहान-ए-नौ की तल'अत को सलाम
हो गया जिस से दरख़्शाँ बातिन-ए-इंसानियत
आप के नूर-ए-फ़रोग़-ए-'इल्म-ओ-हिक्मत को सलाम
जिस के हर पहलू में था लुत्फ़-ए-इलाही जल्वा-गर
पैकर-ए-अख़्लाक़-ए-रब्बानी की सीरत को सलाम
जिस से हर ज़ी-रूह के दिल को सुकूँ मिलने लगा
आप की मख़्लूक़ से बे-पायाँ शफ़क़त को सलाम
जिस की ख़ुश्बू से दमक उठता है फूलों का वुजूद
उस पसीने के मुक़द्दस नूर-ए-निकहत को सलाम
है रवाँ जो चश्मा-ए-ज़मज़म में शामिल आज भी
उस लु'आब-ए-पाक की बे-पायाँ बरकत को सलाम
ने'मत-ए-हर-दो-जहाँ वो निगह-ए-लुत्फ़-ओ-इल्तिफ़ात
प्यारे आक़ा आप की चश्म-ए-'इनायत को सलाम
मोजज़न उस से रगों में इक बहार-ए-जावेदाँ
गुलशन-ए-याद-ए-नबी की प्यारी जन्नत को सलाम
महफ़िल-ए-हस्ती की हर सौत-ए-सताइश पर दुरूद
नूर में भीगे हुए हर हर्फ़-ए-मिदहत को सलाम
शान-ए-पैग़म्बर के हर लहजे की ख़ुश्बू की अमीं
दामन-ए-हर-गुल में रक़्साँ मौज-ए-निकहत को सलाम
फिर सबा आ कर मिरी आँखों से शबनम ले गई
ज़ाइर-ए-शहर-ए-नबी की उस 'इनायत को सलाम
जो बरसता है मिरी आँखों से सावन की तरह
रौज़ा-ए-सरकार पर अश्क-ए-नदामत को सलाम
ज़र-फ़िशाँ होता है ईमाँ उन की निस्बत के तुफ़ैल
अहल-ए-बैत-ए-पाक को आक़ा की 'इत्रत को सलाम
ढूँढता है हर्फ़-ए-मिदहत कहकशाओं में क़लम
आसमाँ पर उस की परवाज़-ए-फ़साहत को सलाम
लौह-ए-दिल पे आज बरसा है 'अज़ीज़ अब्र-ए-कलाम
हर्फ़-ए-तस्लीम-ए-ग़ुलाम और उस की क़िस्मत को सलाम
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