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ग़ज़ल
पर्दा-दारी के ’एवज़ बदनाम-ओ-रुसवा कर दियाऐ ख़याल-ए-यार क्या करना था और क्या कर दिया
बेदम शाह वारसी
सूफ़ी उद्धरण
मुहब्बत करने वालों की नज़र में जन्नत की कोई क़द्र नहीं और वो अपनी मुहब्बत की पर्दा-दारी में ख़ुदा से पोशीदा रहते हैं।
बायज़ीद बस्तामी
ग़ज़ल
अमीर बख़्श साबरी
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ना'त-ओ-मनक़बत
तुम्हीं से दर्स मिला हम को पर्दा-दारी कासिखाया तुम ने हमें ओढ़ना रिदा ज़ैनब
सक़लैन अहमद जाफ़री
कलाम
ये अच्छी पर्दा-दारी है ये अच्छी राज़दारी हैकि जो आए तुम्हारी बज़्म में दीवाना हो जाए
बेदम शाह वारसी
कलाम
नफ़्ख़तु फ़ीहि मिन रूही बता दे इतना बस मुझ कोये कैसी पर्दा-दारी है ये कैसा जल्वा दिखलाना
अब्दुल हादी काविश
कलाम
शर्म-ए-रुस्वाई से जा छुपना नक़ाब-ए-ख़ाक मेंख़त्म है उल्फ़त की तुझ पर पर्दा-दारी हाए हाए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ना'त-ओ-मनक़बत
सर की चादर छिनते ही बालों से पर्दा कर लियापर्दा-दारी कितनी आ'ला क्या ग़ज़ब ज़ैनब में है