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कुंडलिया
साई बेटा बाप के, बिगरे भयो अकाज।
गयउ दुहुन को राज, बाप बेटा में बिगरी।दुस्मन दावागीर, हंसै महिमंडल नगरी।।
गिरिधर कविराय
कुंडलिया
बेटा बिगरे बाप सों, करि तिरियन सों नेहु।
बेटा बिगरे बाप सों, करि तिरियन सों नेहु।लटापटी होने लगी, मोंहि जुदा करि देहु।।
गिरिधर कविराय
पद
आपहि अपना बाप महतारी आपहि अपना बेटा
आपहि अपना बाप महतारी आपहि अपना बेटाआपहि अपना गुरु फिर चेला कालकहरसे झूटा
देवनाथ महाराज
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कुंडलिया
साईं वैर न कीजिये, गुरु पण्डित कवि यार ।
साईं वैर न कीजिये, गुरु पण्डित कवि यार ।बेटा बनिता पौरिया, यज्ञ करावन हार ।।
साई
कुंडलिया
साईं ऐसे पुत्र ते वांझ रहे बरु नारि ।
साईं ऐसे पुत्र ते बांझ रहे बरु नारि ।विगरे बेटा बाप से जाय रहे ससुरारि ।
साई
काफी
मूंह आई बात ना रहन्दी ए
ऐसा बेटा जाइआ माई ए सभ कलमा उस दा कहन्दी ए ।मूंह आई बात ना रहन्दी ए ।
बुल्ले शाह
कलाम
घर से बे-घर तुझे बनाएगा तेरा ही बेटाक़ब्र में तेरी तुझे उतारेगा तेरा ही बेटा
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
कविता
मौत और घसियारा
किसी गांव मे इक घसियारा । रहता था किस्मत का मारा ।बेटा बेटी जोडू जाता। कोई न थे अल्ला से नाता ।।