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कलाम
ऐ हुस्न-ए-जहाँ सोज़-ए-जहाँ दीद-ए-जहाँ दादतश्बीह तेरी अहल-ए-क़लम ढूँढ रहे थे
मुंशी रज़ीउद्दीन अहमद
सूफ़ी कहावत
चुँ यार अहल अस्त, कार सहल अस्त
जब हमारे साथी क्षमता रखने वाले होते हैं तो काम आसान हो जाता है।
वाचिक परंपरा
शे'र
ऐ ग़म मुझे याँ अहल-ए-तअय्युश ने है घेराइस भीड़ में तू ऐ मिरे ग़म-ख़्वार कहाँ है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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सूफ़ी लेख
फ़ारसी गिरह-बंदी की इब्तिदा, फ़ारसी का मंज़ूम कलाम
‘’अल्लाह हू" की तकरार और हज़रत ‘अली की तारीफ़ ही के दौर में क़व्वाली में फ़ारसी
अकमल हैदराबादी
गूजरी सूफ़ी काव्य
उक़्दा कलाम
अरी मेरी सहियाँ मैं डरे पाँत न खाऊँअरी मत उल्टे शीश टंगाऊँ
क़ाज़ी महमूद दरियाई
सूफ़ी शब्दावली
नज़्म
शैदा के हर कलाम की वो बे-मिसालीयाँ
'शैदा' के हर कलाम की वो बे-मिसालीयाँवो 'शाह-बेनज़ीर' की नाज़ुक-ख़यालियाँ
फरोग़ वारसी
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
ग़ज़ल
इस गोशा-ए-तन्हाई से अब निकलो ख़ुदा-रा'क़ैसर' तुम्हें कुछ अहल-ए-क़लम ढूँड रहे हैं


