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ग़ज़ल
न अदा मुझ से हुआ उस सितम-ईजाद का हक़मेरी गर्दन पे रहा ख़ंजर-ए-बेदाद का हक़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
रह-ए-इश्क़ में ये सितम रहे फ़क़त एक मुश्त-ए-ग़ुबार परकभी खाल खींची गई मिरी तो चढ़ा दिया दार पर
अज़ीज़ वारसी देहलवी
ग़ज़ल
सितम की मश्क़ हम अहल-ए-जुनूँ पर जिस क़दर होगीमोहब्बत और भी दिल में हमारे जल्वा-गर होगी
नादिम बल्ख़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
हज़ारों में बेहतर थे जो हक़ पर बा-वफ़ा पहुँचेमदीने से निकल कर इब्न-ए-मौला कर्बला पहुँचे
ख़्वाजा शायान हसन
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ना'त-ओ-मनक़बत
क्या सितम थे कर्बला में जो न उन पर हो गएघर दिलों में करने वाले घर से बे-घर हो गए
क़ैसर रत्नागीरवी
ना'त-ओ-मनक़बत
नाम-ए-हक़ पर अपना घर भर कर दिया जिस ने फ़िदाहैं वो मेरे कारवाँ आक़ा हसन मौला हुसैन
इश्तियाक़ आलम ज़िया शहबाज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
फ़सीलों को हिसारों पर नदी पर आबशारों परजहाँ देखा लिखा देखा हसन मौला हसन मौला
ख़ालिद नदीम बदायूँनी
शे'र
तिरा तर्क-ए-सितम भी इक सितम है ये सितम कैसातिरी तर्क-ए-जफ़ा भी इक जफ़ा है ये जफ़ा क्यूँ है
मुज़तर ख़ैराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
वैसे वफ़ा ख़ुलूस हैं ईसार हैं हसनज़ुल्म-ओ-सितम के सामने तलवार हैं हसन
ख़ालिद नदीम बदायूँनी
ना'त-ओ-मनक़बत
नाम-ए-मुबारक पर तिरे ईमान-ओ-जाँ-ओ-क़ुर्बाँ करूँशौक़-ए-जमालत-ए-बेकराँ ख़्वाजा मु'ईनुद्दीन हसन
अज्ञात
ना'त-ओ-मनक़बत
दर पर तिरे मैं आ पड़ा मेरी ख़बर भी ले ज़रातू है मु'ईनुद्दीन हसन गाही नज़र बर मन फ़िगन
निज़ाम अली
ना'त-ओ-मनक़बत
महबूब-ए-इलाही के दर पर दारैन सँवारा करता हूँदरबार-ए-निज़ामी में आ कर तक़दीर सँवारा करता हूँ
ख़्वाजा नाज़िर निज़ामी
ना'त-ओ-मनक़बत
सब लुटा बैठा हूँ ख़्वाजा मैं तुम्हारे नाम परऔर जो बाक़ी था वो फिर कर दिया नज़राना आज