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सूफ़ी शब्दावली
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ना'त-ओ-मनक़बत
जिस रंग में ऐ यार मुझे तू नज़र आयाऐसा कोई गुल भी नहीं ख़ुश-रू नज़र आया
अब्दुल रहीम कुंजपूरी
ग़ज़ल
मोहब्बत बिकती हो गर शहर में ऐसी दुकाँ ढूँढेंकुदूरत दिल की धुलती हो जहाँ ऐसी दुकाँ ढूँढें
महमूद आलम
दोहा
शेर से डरके जानवर, भजे शहर की ओर
शेर से डरके जानवर, भजे शहर की ओरइस से तो वे वहीं भले, शहर में आदम ख़ोर
डॉ. अफ़रोज़ ताज
कलाम
ख़ुदा जाने ये किस शहर अंदर हमन को लादे डाला हैन दिलबर है न साक़ी है न शीशा है न पियाला है
पंडित चंद्रभान ब्राह्मण
सूफ़ी कहावत
ख़लवत अज़ अग़्यार बायद ने ज़े यार
अजनबियों से अलग रहना चाहिए, दोस्तों से नहीं।
वाचिक परंपरा
ना'त-ओ-मनक़बत
क्या ही सूरत है मिरी यार की अल्लाह अल्लाहमेरी सूरत मिरी दिलदार की अल्लाह अल्लाह




