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ना'त-ओ-मनक़बत
जिस रंग में ऐ यार मुझे तू नज़र आयाऐसा कोई गुल भी नहीं ख़ुश-रू नज़र आया
अब्दुल रहीम कुंजपूरी
ग़ज़ल
ख़ारज़ार-ए-’इश्क़ से ऐ शौक़ निकलो तुम कहींगुलशन-ए-हस्ती से हो जाओगे वर्ना गुम कहीं
शाह अमीन अहमद फ़िरदौसी
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ना'त-ओ-मनक़बत
क्या कहूँ हिज्र है अच्छा कि विसाल अच्छा हैजिस में महबूब-ए-ख़ुदा ख़ुश हैं वो हाल अच्छा है
अरशद अमरोहवी
कलाम
अपनी निगाह-ए-शौक़ को रोका करेंगे हमवो ख़ुद करें निगाह तो फिर क्या करेंगे हम
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
रूमी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ख़ेशतन दारी कुनेद ऐ आशिक़ाँ बा-दर्द-ए-इश्क़गरचे मा बारी न एम अज़ इश्क़-बाज़ी मर्द-ए-इश्क़
हकीम सनाई
सूफ़ी कहावत
ख़लवत अज़ अग़्यार बायद ने ज़े यार
अजनबियों से अलग रहना चाहिए, दोस्तों से नहीं।
वाचिक परंपरा
फ़ारसी कलाम
ऐ ज़ दर्द-ए-'इश्क़-ए-तू बीमार-ए-जाँ दारम हनूज़दाश्तम मेहर-ए-तू दर दिल हम-चुनाँ दारम हनूज़



