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ना'त-ओ-मनक़बत
ऐ सल्ले-'अला दिल की दुनिया कुछ और ही पाई जाती हैसरकार-ए-दो-’आलम की सूरत आँखों में समाई जाती है
शकील बदायूँनी
ग़ज़ल
जुनूँ वज्ह-ए-शिकस्त-ए-रंग-ए-महफ़िल होता जाता हैज़माना अपने मुस्तक़बिल में दाख़िल होता जाता है
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
शिकस्त-ए-ख़ातिर-ए-'आशिक़ में है रँग उन की महफ़िल काउसी तस्वीर पर है आईना टूटे हुए दिल का
अफ़सर सिद्दीक़ी अमरोहवी
बैत
वहशत-ए-क़ैस पे हँसने की सज़ा पाई है
वहशत-ए-क़ैस पे हँसने की सज़ा पाई हैअब वहाँ हूँ कि मुझे अपनी ख़बर कुछ भी नहीं
कामिल-उल-क़ादरी
ना'त-ओ-मनक़बत
क़दम-क़दम पे मलक मुझ पे भेजते हैं सलामरह-ए-फ़ना में चला ले के मैं हुसैन का नाम