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सूफ़ी लेख
शम्स तबरेज़ी - ज़ियाउद्दीन अहमद ख़ां बर्नी
ज़े-आतिशे जुफ़्त व-अंगबीं महरूमदर फ़िराक़-ए-जमालत मा रा
ख़्वाजा हसन निज़ामी
सूफ़ी लेख
हज़रत शैख़ फ़ख़्रुद्दीन इ’राक़ी रहमतुल्लाह अ’लैह
न-शुद जाँ महरम-ए-असरार-ए-जानाँबराँ महरूम-ए-ना-महरम ब-गिर्यम
सूफ़ीनामा आर्काइव
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ज़िक्र-ए-ख़ैर ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़
दरवाज़े का तेरे हूँ गदा भीक दे मेरीमहरूम न कर मेरी तू है साल की फेरी
रय्यान अबुलउलाई
सूफ़ी लेख
समकालीन खाद्य संकट और ख़ानक़ाही रिवायात
मुझे ये लंबी तम्हीद इसलिए बाँधनी पड़ी ताकि भूक और ख़ुराक की क़िल्लत जैसे आ’लमी बोहरान
रहबर मिस्बाही
सूफ़ी लेख
अयोध्या की राबिया-ए-ज़मन – हज़रत सय्यदा बड़ी बुआ
1940 तक एक कुआँ मुस्लिम यतीम-ख़ाना की इमारत के शिमाली जानिब कोने पर मौजूद था जो
सय्यद रिज़्वानुल्लाह वाहिदी
सूफ़ी लेख
अबू मुग़ीस हुसैन इब्न-ए-मन्सूर हल्लाज
अंदाज़-ए-बयान पर कोई ए’तराज़ नहीं किया जा सकता लेकिन उनमें से कोई चीज़ न सिर्फ़ तसव्वुफ़
मयकश अकबराबादी
सूफ़ी लेख
मंसूर हल्लाज
हज़रत उ’मर बिन उ’स्मान रहमतुल्लाहि-अ’लैह को मंसूर की ये हरकत सख़्त ना-गवार गुज़री और वो उन
निज़ाम उल मशायख़
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उमर ख़ैयाम श्रीयुत इक़बाल वर्मा, सेहर
यह दुनिया न तो फिरने की जगह है, न बैठने की। इस में जो बुद्धिमान हैं
हिंदुस्तानी पत्रिका
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शाह नियाज़ बरैलवी ब-हैसिय्यत-ए-एक शाइ’र
(हुज़ूर नियाज़)इन मुक़द्दमात को ज़ेहन-नशीन कर लेने के बा’द अब फ़ारसी के मशाहीर शो’रा के कलाम
मयकश अकबराबादी
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ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगान हज़रत ख़्वाजा मुई’नुद्दीन चिश्ती अजमेरी - आ’बिद हुसैन निज़ामी
हज़रत ने फ़रमाया कि मैं इस ग़रीब के काम के लिए आया हूँ। फिर क़ुतुब साहिब
सूफ़ीनामा आर्काइव
सूफ़ी लेख
ताजुल-आ’रिफ़ीन मख़दूम शाह मुजीबुल्लाह क़ादरी – हकीम शुऐ’ब फुलवारवी
उस वक़्त आपके हम-उ’म्रों और क़राबत-मंदों में से एक बुज़ुर्ग हज़रत शाह मोहम्मद मख़्दूम क़ादरी जा’फ़री
निज़ाम उल मशायख़
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हज़रत सय्यिद मेहर अ’ली शाह - डॉक्टर सय्यिद नसीम बुख़ारी
यूं मौलाना सुल्तान महमूद ने इस वाक़िआ’ की तलाफ़ी की जब उनके घोड़े की लगाम पीर
मुनादी
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हज़रत शाह नियाज़ बरेलवी की शाइरी में इरफान-ए-हक़
लफ़्ज़-ए-'जंग' को इस मक़ाम पर उन्होंने मुज़क्कर के सेग़े में इस्तिमाल किया है, जब्कि उमूमन लफ़्ज़
अहमद फ़ाख़िर
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मूजिद-ए-क़व्वाली
मशाहीर अह्ल-ए-क़लम इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि क़व्वाली की तर्ज़ अमीर ख़ुसरो की ईजाद है।
अकमल हैदराबादी
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हज़रत मख़्दूम दरवेश अशरफ़ी चिश्ती बीथवी
सूबा-ए-बिहार के गया ज़िला’ में गया शहर से तक़रीबन तीन मील शिमाल गया जहानाबाद रोड पर
मुनीर क़मर
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याद रखना फ़साना हैं ये लोग - डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन ख़ाँ
तारीख़ दो तरह की होती है।एक वाक़ई’ तारीख़ जो बड़ी तलाश-ओ-तहक़ीक़,बड़ी छान-बीन के बा’द किताबों में