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कलाम
पिया तुझ आश्ना हूँ मैं तू बे-गाना न कर मुझ कोटले न इक घड़ी तुझ याद बिन तू ना-बिसर मुझ को
कुली कुतुब शाह
कलाम
'अजब अंदाज़ तुझ को नर्गिस-ए-मस्ताना आता हैकि हर होशियार बनने को यहाँ दीवाना आता है