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कलाम
जिसे दीद तेरी नसीब हो वो नसीब क़ाबिल-ए-दीद हैकि शब-ए-बरात है रात उसे दिन उस के वास्ते 'ईद है
अश्क रामपुरी
कलाम
बनाई मुझ बे-नवा की बिगड़ी नसीब मेरा जगा दियातेरे करम के निसार तू ने मुझे भी जीना सिखा दिया
अज्ञात
कलाम
मुझे क्या क़रार नसीब हो मेरी आज तक तलबी नहींमैं हनूज़ तिश्ना-ए-दीद हूँ जो लगी हुई है बुझी नहीं
अज्ञात
कलाम
बनायी मुझ बेनवा की बिगड़ी नसीब मेरा जगा दियातेरे करम के निसार तूने मुझे भी जीना सिखा दिया
फ़ना बुलंदशहरी
कलाम
शाह चाँद अशरफ़
कलाम
मोहम्मद अशरफ़
कलाम
दूर जब तक रहे हम बा-दिल-ए-नाशाद रहेपास हम तख़्ता-ए-मश्क़-ए-सितम-ईजाद रहे
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
कलाम
अपनी निगाह-ए-शौक़ को रोका करेंगे हमवो ख़ुद करें निगाह तो फिर क्या करेंगे हम
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
कलाम
न किसी चीज़ में दिल उन का लगा मेरे बा'दयाद आती ही रही मेरी वफ़ा मेरे बा'द
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
कलाम
ऐ जान-ए-जहाँ कब तक ये गोशा-ए-तन्हाईसब दीद के तालिब हैं जितने हैं तमाशाई
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
कलाम
छुड़ा देती है फ़िक्र-ए-ग़ैर से तासीर-ए-मय-ख़ानामिली है 'अर्श की ज़ंजीर से ज़ंजीर-ए-मय-ख़ाना