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तेरे बग़ैर साक़िया लज़्ज़त-ए-मय-कशी नहींआँखों में मस्तियाँ नहीं दिल में शगुफ़्तगी नहीं
दाम-ए-त’अय्युनात में दीदा-ओ-दिल उलझ गएसोज़-ए-यक़ीं के साथ साथ लज़्ज़त-ए-काफ़री भी दी
हो न शिकार-ए-बे-दिली लज़्ज़त-ए-ग़म उठाए जादिल न बना नहीं सही दर्द को दिल बनाए जा
कसरत में बू है वहदत की 'रिज़वाँवहदत में लज़्ज़त वसलत की रिज़वाँ
ख़ुदा वो दिन न लाए जो कहूँ मैंगुनाहों में भी अब लज़्ज़त कहाँ है
कैसा फ़िशार कैसी अज़िय्यत फ़िशार कीलज़्ज़त मिली है क़ब्र में आग़ोश-ए-यार की
मकतबों में कहीं रा’नाई-ए-अफ़्कार भी हैख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है
आफ़रीं कहने से रुक जाता है क़ातिल मेरालज़्ज़त-ए-क़त्ल घटाता है बढ़ाना दिल का
है इश्क़ के रोज़े में फ़क़त लज़्ज़त-ए-सहरीता-'उम्र नहीं सूरत-ए-इफ़्तार ख़बर-दार
ऐ 'वली' लज़्ज़त आज़ाद क़फ़स क्या जानोनौ गिरफ़्तार हो तुम ने अभी क्या देखा है
हसरत-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार रही जाती हैजादा-ए-राह-ए-वफ़ा जुज़ दम-ए-शमशीर नहीं
वो बादा-ए-शबाना की सरमस्तियाँ कहाँउठिए बस अब कि लज़्ज़त-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई
फ़िराक़-ए-यार में लज़्ज़त नहीं है जीने कीपिला के ज़हर मुझे शाम से सुला देना
बे-'इश्क़ 'उम्र कट नहीं सकती है और याँताक़त ब-क़दर-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
गुनह गुनह न रहा इतनी बादा-नोशी कीअब एक शग़्ल है कुछ लज़्ज़त-ए-शराब नहीं
’इशरत-ए-पारा-ए-दिल ज़ख़्म-ए-तमन्ना खानालज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक-दाँ होना
इन्न-फ़ी-क़त्ली-हयाती का रहे नश्शा जिसेदार पर सौ बार लटके लज़्ज़त-ए-दीदार में
वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथहम को हरीस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार देख कर
नई लज़्ज़त नई मस्ती टपकती है निगाहों सेतिरी आँखें हैं या साक़ी मय-ए-कौसर के पैमाने
वही तस्लीम है जिस में ख़ुदावंदी की लज़्ज़त होवही है बंदगी जिस में सुरूर-ए-सरवरी आए
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