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मर मिटे जब हम तो कुछ-कुछ राह पर आने लगेवो हमारी क़ब्र को आ-आ के ठुकराने लगे
माटी के पुतले तुझे कितना गुमान हैतेरी औक़ात क्या क्या तिरी शान है
मैं माटी की मूर्ती माटी मेरा देसमाटी मोरी जात है मैं लाई सन्देस
हुस्न-ओ-जवानी सब है फ़ानी चार दिनों की है ये कहानीक्या इस पर इतराना है माटी की काया को एक दिन माटी में मिल जाना है
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ
तिरी मोहब्बत ने मार डाला हज़ार ईज़ा से मुझ को ज़ालिमरुला-रुला कर घुला-घुला कर जला-जला कर मिटा-मिटा कर
मिटा कर हस्ती-ए-मौहूम अपनीमआल-ए-ज़िंदगानी चाहता हूँ
दुख आए सुख भाग गएसब ऐ'श मिटा सारा चैन पिया
कोई उन को मिटा नहीं सकताग़म के ऐसे निशान होते हैं
'दाग़' की क़ब्र मिटा कर बोलेये निशान था उसी सौदाई का
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो यूँ भी सहीभला कोई 'कामिल' मिटा जाए ना
मिटा कर आप को देखा तो पायावही बे-चूँ-चरा है मैं नहीं हूँ
पाकीज़ा तमन्नाएँ भी लाती हैं उदासीहर ज़ौक़-ए-तलब शौक़-ए-तमन्ना ही मिटा दे
सूरत-ए-हस्ती-ए-मौहूम ‘निसार’-ए-ख़स्ताआप के आगे मिटा लूँ तो चले जाएगा
सभी अंधेरे बुराई के एक हो कर भीमिटा न पाए मोहब्बत की रौशनी की अकड़
गुज़श्ता ख़ाक-नशीनों की यादगार हूँ मैंमिटा हुआ सा निशान-ए-सर-ए-मज़ार हूँ मैं
मैं एक नक़्श-ए-आब 'निज़ामी' था दरमियाँउस ने मिटा दिया मुझे बे-कार देख कर
हस्ती मिटा कर अपनी वुजूद निगार मेंहम हो गए फ़ना तो बक़ा है हमारे पास
शम' की मानिंद घुल कर जो मिटा दे ज़ुल्मतें'इश्क़ वालो कोई दिखलाओ वो दीवाना मुझे
क़ातिल से मिटा दीजिए हर रोज़ का झगड़ारख दीजिए ख़ंजर के तले अपना जिगर आज
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